जयगुरुदेव मेले में उमड़ रहा है आस्था का सैलाब
मथुरा, 11 दिस.। जयगुरुदेव आश्रम मथुरा में चल रहे वार्षिक भण्डारा सत्संग मेला के चैथे दिन राष्ट्रीय उपदेशक बाबूराम और राजेश जी ने श्रद्धालुओं को सम्बोधित किया। कबीर साहब की पंक्ति ‘साधो यह मुर्दों का गांव’ पंक्ति को उद्धृत करते हुये बाबूराम जी ने बताया कि संसार से एक न एक दिन सबको छोड़कर जाना है। जब सब छोड़कर जाना है तो अरबों-खरबों की सम्पत्ति संचित कर लेना और बहुत बड़ी सामथ्र्य हासिल कर लेने से क्या लाभ। संचय की प्रवृत्ति दुःखदाई होती है। जिसका सार ही संशय है उसका नाम संसार है। संशय और भ्रम के देश में भ्रम के विचार दृढ़ होते हैं। इन दृढ़ विचारों की जंजीर को कोई नहीं तोड़ पाया। जिस प्रकार वर्षा ऋतु के बाद जब शरद ऋतु आती है तो उष्मज जीव ठण्डी के प्रभाव से नष्ट हो जाते हंै। ठीक इसी तरह जब सतगुरु मिल जाते हैं तो सब संशय भ्रम खत्म हो जाता है। इस संसार में सत्गुरु के बराबर कोई रत्न नहीं है। ‘अंत लखा सो संत कहावे’ की व्याख्या करते हुये बताया कि जिसने उस प्रभु को देख लिया, प्राप्त कर लिया उसी को संत कहते हैं। वे सुरत-शब्द के भेद को बताते हैं। मनुष्य इस जड़ संसार में जो लोग सुख, पे्रम की खोज में रात-दिन भटकते रहते हैं। लोभ रूपी कुत्ता कभी चुप नहीं बैठता है। कभी परमात्मा का शुक्रिया नहीं करते हैं कि सब परमात्मा का है। जो वह दे दें ठीक है। परमात्मा से मांगते चले जा रहें। प्यारे बेटे को बाप से मांगने की जरूरत नहीं पड़ती है। जब तक कामनायें होंगी शब्द सुनाई नहीं देंगा। जैसे रजनी और सूरज में विपरीत सम्बन्ध होता है ठीक वैसे ही संसार की कामना और नाम में है। इसलिये गुरु से पे्रम करने वाले कभी दुनियाबी चीज नहीं मांगते हैं। अपने प्रारब्ध पर भरोसा और गुरु पर विश्वास कर कर्म करना चाहिये।
राष्ट्रीय उपदेशक राजेश ने कहा कि गुरु के प्रति पे्रम और प्यार पैदा होना कोई मामूली बात नहीं है क्योंकि हमारे खोटे पाप-कर्म संत महात्माओं के पास जाने नहीं देते हैं। महात्मा के बताये रास्ते पर चलने से मन शांत हो जाता है। जैसे-जैसे शब्द सुनाई देने लगेगा वैसे-वैसे अन्दर में पे्रम बढ़ता जाता है। पे्रम ही व्यक्ति के अन्दर त्याग पैदा करता है न कि त्याग पे्रम पैदा करता है। जब जीव महापुरुष की संगत में आकर नाम की लज्जत लेने लगता है और हृदय में पे्रम का चिराग जल जाता है तो वह दुनिया के लोक-लाज की परवाह नहीं करता है। पे्रम का मार्ग कठिन है लेकिन चलने वालों के लिये आसान है। रीति-रिवाज अलग-अलग होते हैं। जितनी सरियतें हैं अलग-अलग नजर आती हैं लेकिन उसमें रूहानियत एक है। रूहानियत और सरियत का सम्बन्ध उसी तरह से है जिस तरह से सोने के गहने और उसके डिब्बे की। कीमत गहने की होती है डिब्बे की नहीं।
मेले में 22 जोड़े दहेज रहित विवाह सम्पन्न हो चुके हैं। श्रद्धालु अपने घरों को वापिस लौटने लगे हैं। मन्दिर में पूजन और प्रसाद वितरण का कार्य निरन्तर चल रहा है।